गुल की सूरत बिखर बिखर जाए
By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
गुल की सूरत बिखर बिखर जाए
ज़िंदगी बस कहीं गुज़र जाए
प्यास बुझती नहीं शराबों से
इन पियालों में ज़ह्र भर जाए
चाँद कुछ देर तेरी छत पे रहे
फिर मिरे जाम में उतर जाए
अब वो बाँहें भी सो गई होंगी
किन उमीदों पे कोई घर जाए
आज की रात है बहुत भारी
आज की रात बस गुज़र जाए
‘अर्श-ओ-कुर्सी तसव्वुरात में हैं
अब कहाँ तक के ये नज़र जाए
ज़िंदगी बस कहीं गुज़र जाए
प्यास बुझती नहीं शराबों से
इन पियालों में ज़ह्र भर जाए
चाँद कुछ देर तेरी छत पे रहे
फिर मिरे जाम में उतर जाए
अब वो बाँहें भी सो गई होंगी
किन उमीदों पे कोई घर जाए
आज की रात है बहुत भारी
आज की रात बस गुज़र जाए
‘अर्श-ओ-कुर्सी तसव्वुरात में हैं
अब कहाँ तक के ये नज़र जाए
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