हद है क़फ़स की हब्स से दीवार-ओ-दर जले

By mustafa-adeebJanuary 4, 2024
हद है क़फ़स की हब्स से दीवार-ओ-दर जले
देखो पराई आग से अपना भी घर जले
पहुँचा है ला-मकाँ से भी आगे मिरा ख़याल
अहल-ए-नज़र की हद थी सो अहल-ए-नज़र जले


अपने हसद की आग में जलता रहा 'अदू
मेरी उड़ान देख के कितनों के पर जले
साहिल की जाँ लबों पे थी शिद्दत से प्यास की
दरिया की बे-दिली से किनारे शजर जले


पलकों ने इस तरह से तराशे हैं अश्क-ए-तर
ये आब-ए-गिर्या देख के ला'ल-ओ-गुहर जले
हम बाँटते रहे हैं अँधेरों में रौशनी
हम रौशनी-पसंदों से शम्स-ओ-क़मर जले


24746 viewsghazalHindi