है नियाज़-ए-‘इश्क़ से बे-ख़बर जो न निकले पर्दा-ए-नाज़ से

By badiuzzaman-saharJanuary 19, 2024
है नियाज़-ए-‘इश्क़ से बे-ख़बर जो न निकले पर्दा-ए-नाज़ से
दिल-ए-'ग़ज़नवी' में तड़प थी क्या कोई पूछे ज़ुल्फ़-ए-'अयाज़' से
मिरे हाल-ए-दिल की रिवायतें ये छुपी छुपी सी हिकायतें
ये कहाँ कहाँ न पढ़ी गईं तिरे रू-ए-मुसहफ़-ए-नाज़ से


मिरे दिल को आ मिरे मीत ले मिरे जिस्म-ओ-जान को जीत ले
कहीं हार जाए न ज़िंदगी ग़म-ए-हिज्र-हा-ए-दराज़ से
ये शिकस्ता तार ये कुश्ता तन ये ग़िना में डूबा हुआ बदन
सुनो धीमे धीमे है नग़्मा-ज़न ये ख़मोशी-ए-लब-ए-साज़ से


ये है कोर-चश्मों की अंजुमन है बला से मेरी ये ज़ौ-फ़गन
यहाँ किस नज़र में है बाँकपन जो मिलाए दीदा-ए-बाज़ से
मिरे दिल के तार को छेड़ कर जो उठे ये नाला-ए-पुर-असर
तो जला न दे तिरे बाम-ओ-दर ये शरार-ए-शो'ला-ए-साज़ से


ये कमाल-ए-शाना नहीं 'सहर' है जमाल-ए-आइना-ए-नज़र
ये परेशाँ कैसे सँवर गई ज़रा पूछो ज़ुल्फ़-ए-दराज़ से
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