हैं उलझनें तमाम मिरी ज़िंदगी के साथ

By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
हैं उलझनें तमाम मिरी ज़िंदगी के साथ
इंसाफ़ कर रहा हूँ मगर शा'इरी के साथ
ये और बात है मैं ज़ियादा न मिल सकूँ
मिलता नहीं किसी से मगर बे-दिली के साथ


काम आई तीरगी में चराग़ों की दोस्ती
गुज़री शब-ए-हयात मिरी रौशनी के साथ
बिखरे हुए वजूद को अपने समेट कर
हम जीना चाहते हैं बड़ी सादगी के साथ


है जिस का जैसा ज़र्फ़ वो वैसा किया करे
करते नहीं हैं हम तो दग़ा दोस्ती के साथ
'आलम' अमीर-ए-शहर भी करता है एहतिराम
रहते हैं इतनी शान से हम मुफ़लिसी के साथ


42154 viewsghazalHindi