हल्की हल्की बारिश मेरे दिल को यूँ तड़पाती है

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
हल्की हल्की बारिश मेरे दिल को यूँ तड़पाती है
यौवन में इक गोरी जैसे पर्दे में छुप जाती है
दिल से मेरे ग़म के साए आप ही छटने लगते हैं
मौसम-ए-गुल में जैसे जैसे याद तुम्हारी आती है


क्या सावन कैसी बरसातें क्या सखियाँ क्या मिलन की रात
रोता है दिल तड़प तड़प जब याद पिया की आती है
जाने कब उस से मिलना हो सोच सोच हैरान है दिल
आस भी मेरे दिल की आख़िर दिल ही में रह जाती है


शाम ढले बैठे बैठे दिल बोझल सा हो जाता है
माज़ी का इक इक लम्हा जब याद तिरी दोहराती है
आज़ादी के नाम पे 'औरत आ बैठी बाज़ारों में
ऐसी कली तो खिलने से कुछ पहले ही मुरझाती है


हम से 'वजाहत' मत पूछो इस दौर में कैसे ज़िंदा हैं
रातों को हम जागते हैं और नींद अक्सर उड़ जाती है
92386 viewsghazalHindi