हमें साथ मिल तो गया था किसी का
By balbir-rathiJanuary 2, 2024
हमें साथ मिल तो गया था किसी का
मगर मुख़्तसर था सफ़र ज़िंदगी का
कहाँ आ गए हम भटकते भटकते
यहाँ तो निशाँ तक नहीं रौशनी का
तमद्दुन की ये कौनसी मंज़िलें हैं
कि दुश्मन हुआ आदमी आदमी का
वफ़ा एक मुद्दत हुई मिट चुकी है
कहाँ नाम लेते हो अब दोस्ती का
अगर साथ होते वो इन रास्तों पर
तो क्या हाल होता मिरी आगही का
मिरे हाल पर मुस्कुरा कर गए हैं
चलो हक़ अदा हो गया दोस्ती का
मगर मुख़्तसर था सफ़र ज़िंदगी का
कहाँ आ गए हम भटकते भटकते
यहाँ तो निशाँ तक नहीं रौशनी का
तमद्दुन की ये कौनसी मंज़िलें हैं
कि दुश्मन हुआ आदमी आदमी का
वफ़ा एक मुद्दत हुई मिट चुकी है
कहाँ नाम लेते हो अब दोस्ती का
अगर साथ होते वो इन रास्तों पर
तो क्या हाल होता मिरी आगही का
मिरे हाल पर मुस्कुरा कर गए हैं
चलो हक़ अदा हो गया दोस्ती का
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