हाँ बिखरने दे तसल्ली से दिल-ए-बिस्मिल मुझे

By sarfaraz-bazmiJanuary 4, 2024
हाँ बिखरने दे तसल्ली से दिल-ए-बिस्मिल मुझे
ऐ धड़कते दिल ठहर जा मिल गई मंज़िल मुझे
अब्र-ए-नैसाँ चादर-ए-शफ़्फ़ाफ़ बर महमिल मुझे
चाँद क्या है बस किसी रुख़्सार का इक तिल मुझे


ज़लज़ले हर साँस में हर हर नफ़स कर्ब-ए-हयात
चैन से जीने न देगा इज़्तिराब-ए-दिल मुझे
अब ये मेरे ज़ेहन का बदलाव है या बेबसी
जाने क्यों वो संग-दिल लगता है दरिया-दिल मुझे


सब्ज़ गहरे रंग की चादर लपेटे कोहसार
ख़िज़्र-सामाँ आ कभी इन वादियों में मिल मुझे
आज़माता है मगर ये ख़ुश-नसीबी कम नहीं
उस ने समझा है जो अपने प्यार के क़ाबिल मुझे


वक़्त आने दे पसीना आएगा हर मौज को
क्यों समझता है कोई कटता हुआ साहिल मुझे
सर हथेली पर लिए जब मैं सर-ए-मक़्तल गया
देखता था दम-ब-ख़ुद ख़ंजर-ब-कफ़ क़ातिल मुझे


फ़ित्ना-सामानी के दिन साग़र-ब-लब शीशा-ब-दस्त
मौत का सामाँ न हो जाए तिरी महफ़िल मुझे
आज भी शाहिद है 'बज़्मी' वादी-ए-जबरालटर
कश्तियाँ अपनी जलाईं तब मिला साहिल मुझे


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