हर चंद तेरे शहर के अब कूचा-गर्द हैं

By basheer-ahmad-basheerJanuary 2, 2024
हर चंद तेरे शहर के अब कूचा-गर्द हैं
लेकिन इस अपने दौर में हम लोग फ़र्द हैं
समझे नहीं ज़बान ग़ज़ालों की आज तक
हम भी जो एक 'उम्र से सहरा-नवर्द हैं


गुज़रे हैं हम भी पेच-ओ-ख़म-ए-राह-ए-ज़ीस्त से
या'नी कि हम भी वाक़िफ़-ए-हर-गर्म-ओ-सर्द हैं
क्या क्या हैं इख़्तियार-ओ-इरादा की तोहमतें
हम पर बिसात-ए-जब्र की जो एक नर्द हैं


जिस से गुदाज़-ओ-गर्म ज़मीर-ए-वजूद है
हम सीना-ए-हयात की वो आह-ए-सर्द हैं
देखा है आज हम ने भी जा कर 'बशीर' को
बे-शक अभी ज़माने में कुछ अहल-ए-दर्द हैं


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