हर हर शजर उमीद था हर हर शजर था यास
By shamsur-rahman-faruqiJanuary 5, 2024
हर हर शजर उमीद था हर हर शजर था यास
हर हर शजर की छाओं में इक शहर बन गया
फूला-फला था वक़्त के हाथों तो वक़्त ही
सहरा-ए-आरज़ू के लिए ज़हर बन गया
नमनाक रू-ए-शाम पे गुल-चाँदनी का रंग
जलते पे तेल सा ही कोई क़हर बन गया
बादल का आसमान पे बनता बिगड़ता रूप
याद-ए-मिज़ाज-ए-यार की इक लहर बन गया
शब को तिरा ख़याल सुकूत-ए-नमाज़ में
आमीन की हिकायत-ए-बिल-जह्र बन गया
हर हर शजर की छाओं में इक शहर बन गया
फूला-फला था वक़्त के हाथों तो वक़्त ही
सहरा-ए-आरज़ू के लिए ज़हर बन गया
नमनाक रू-ए-शाम पे गुल-चाँदनी का रंग
जलते पे तेल सा ही कोई क़हर बन गया
बादल का आसमान पे बनता बिगड़ता रूप
याद-ए-मिज़ाज-ए-यार की इक लहर बन गया
शब को तिरा ख़याल सुकूत-ए-नमाज़ में
आमीन की हिकायत-ए-बिल-जह्र बन गया
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