हर जगह हर वक़्त गोया इक कमी तेरे बग़ैर

By iram-lakhnaviJanuary 3, 2024
हर जगह हर वक़्त गोया इक कमी तेरे बग़ैर
क्या हुई जाती है मेरी ज़िंदगी तेरे बग़ैर
मौत का ग़म है न जीने की ख़ुशी तेरे बग़ैर
ज़िंदगी है एहतिजाज-ए-ज़िंदगी तेरे बग़ैर


आह निकली होंट काँपे अश्क आँखों में भर आए
मुस्कुराने की अगर कोशिश भी की तेरे बग़ैर
ऐ हमा हुस्न-ओ-नज़ाकत ऐ मुजस्सम रंग-ओ-बू
दिल-गिरफ़्ता है चमन में हर कली तेरे बग़ैर


देखते ही देखते फ़ितरत में आया इंक़लाब
इक नुमायाँ तीरगी है रौशनी तेरे बग़ैर
अब वहाँ मैं हूँ जहाँ ये भी समझ सकता नहीं
किस तरह आती है दुनिया में हँसी तेरे बग़ैर


है अमानतदार-ए-ख़ामोशी मिरे मुँह में ज़बान
हाए-रे ख़ुद-इख़्तियारी बेबसी तेरे बग़ैर
'इश्क़ से तकमील-ए-हुस्न और हुस्न से तकमील-ए-‘इश्क़
इक कमी मेरे बग़ैर और इक कमी तेरे बग़ैर


सर हो सज्दे में तो दिल में कौन हो तेरे सिवा
ऐ म’आज़-अल्लाह तेरी बंदगी तेरे बग़ैर
एक तारा टूट कर तारीकियों में खो गया
रात 'इरम' ने इस तरह एक आह की तेरे बग़ैर


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