हज़ार ज़ख़्म मिले फिर भी मुस्कुराते हुए
By wasim-nadirJanuary 5, 2024
हज़ार ज़ख़्म मिले फिर भी मुस्कुराते हुए
गुज़र गया है कोई रास्ता बनाते हुए
'अज़ाब पूछे कोई हम से कम-लिबासी का
तमाम 'उम्र कटी है बदन छुपाते हुए
ये किस गुनाह का एहसास है मिरे दिल को
निगाह उठती नहीं रौशनी में आते हुए
वो पूछ बैठा था मुझ से सबब बिछड़ने का
ज़बान काँप गई उस को सच बताते हुए
तुम्हारे नाम के आँसू हैं मेरी आँखों में
ये बात भूल न जाना मुझे रुलाते हुए
गुज़र गया है कोई रास्ता बनाते हुए
'अज़ाब पूछे कोई हम से कम-लिबासी का
तमाम 'उम्र कटी है बदन छुपाते हुए
ये किस गुनाह का एहसास है मिरे दिल को
निगाह उठती नहीं रौशनी में आते हुए
वो पूछ बैठा था मुझ से सबब बिछड़ने का
ज़बान काँप गई उस को सच बताते हुए
तुम्हारे नाम के आँसू हैं मेरी आँखों में
ये बात भूल न जाना मुझे रुलाते हुए
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