हज़ारों पेच-ओ-ख़म और जुस्तुजू-ए-दाइमी कब तक
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
हज़ारों पेच-ओ-ख़म और जुस्तुजू-ए-दाइमी कब तक
अगर मंज़िल कोई शय है तो फिर ये गुमरही कब तक
गुरेज़ाँ जादा-ए-इंसानियत से आदमी कब तक
छुपाई जाएगी तारीकियों में रौशनी कब तक
रहे कोई परेशाँ-हाल-ओ-महरूम-ए-ख़ुशी कब तक
सुलगती डूबती सहमी हुई सी ज़िंदगी कब तक
ज़बाँ दी है तो फिर हुक्म-ए-ज़बाँ-बंदी से क्या हासिल
अब इज़्न-ए-लब-कुशाई दे ये जब्र-ए-ख़ामुशी कब तक
दम-ए-नज़्ज़ारा इक शो'ला सा चमका होश खो बैठे
नहीं मा'लूम उस के बा'द ये हालत रही कब तक
इजाज़त हो अगर तो पूछ लूँ इन होश वालों से
रहेगी बहस का 'उनवाँ मिरी दीवानगी कब तक
तड़पती चीख़ती रोती हुई ग़मनाक-ओ-अफ़्सुर्दा
इसी का नाम अगर है ज़िंदगी तो ज़िंदगी कब तक
ज़रा बिगड़े हुए इंसाँ को होश आ जाए तो पूछूँ
ये ख़ुद-बीनी कहाँ तक ये फ़रेब-ए-आगही कब तक
नहीं मिलता तो फिर ख़ुद अपना हिस्सा छीन ले बढ़ कर
ये मजबूरी की धुन पर नग़्मा-ए-बेचारगी कब तक
कोई आसूदा-ओ-सैराब क्यों होता नहीं 'मैकश'
ये मय-ख़ाना है मयख़ाने में दौर-ए-तिश्नगी कब तक
अगर मंज़िल कोई शय है तो फिर ये गुमरही कब तक
गुरेज़ाँ जादा-ए-इंसानियत से आदमी कब तक
छुपाई जाएगी तारीकियों में रौशनी कब तक
रहे कोई परेशाँ-हाल-ओ-महरूम-ए-ख़ुशी कब तक
सुलगती डूबती सहमी हुई सी ज़िंदगी कब तक
ज़बाँ दी है तो फिर हुक्म-ए-ज़बाँ-बंदी से क्या हासिल
अब इज़्न-ए-लब-कुशाई दे ये जब्र-ए-ख़ामुशी कब तक
दम-ए-नज़्ज़ारा इक शो'ला सा चमका होश खो बैठे
नहीं मा'लूम उस के बा'द ये हालत रही कब तक
इजाज़त हो अगर तो पूछ लूँ इन होश वालों से
रहेगी बहस का 'उनवाँ मिरी दीवानगी कब तक
तड़पती चीख़ती रोती हुई ग़मनाक-ओ-अफ़्सुर्दा
इसी का नाम अगर है ज़िंदगी तो ज़िंदगी कब तक
ज़रा बिगड़े हुए इंसाँ को होश आ जाए तो पूछूँ
ये ख़ुद-बीनी कहाँ तक ये फ़रेब-ए-आगही कब तक
नहीं मिलता तो फिर ख़ुद अपना हिस्सा छीन ले बढ़ कर
ये मजबूरी की धुन पर नग़्मा-ए-बेचारगी कब तक
कोई आसूदा-ओ-सैराब क्यों होता नहीं 'मैकश'
ये मय-ख़ाना है मयख़ाने में दौर-ए-तिश्नगी कब तक
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