हो रहा है कली पर चमन का गुमाँ

By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
हो रहा है कली पर चमन का गुमाँ
क़ाबिल-ए-दीद है अब मिरा गुलसिताँ
है मिरा ज़िक्र भी आप की दास्ताँ
आप होते रहें मुझ से दामन-कशाँ


क्यों भड़कता नहीं अब ये सोज़-ए-निहाँ
थोड़ा थोड़ा सा कब तक उठेगा धुआँ
हो रहा है मुझे रौशनी का यक़ीं
जिस क़दर बढ़ रही हैं ये तारीकियाँ


क़ैद दैर-ओ-हरम की लगाते हैं क्यों
एक दिल भी तो है आप का आस्ताँ
तेज़ होते गए और भी कुछ क़दम
जिस क़दर राह में आएँ दुश्वारियाँ


आप आए भी लेकिन इस अंदाज़ से
बढ़ गईं और 'मैकश' की तन्हाइयाँ
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