होंटों पे तबस्सुम का लबादा तो नहीं था
By ahmad-azeemFebruary 5, 2024
होंटों पे तबस्सुम का लबादा तो नहीं था
ऐ दिल सम-ए-अंदोह ज़ियादा तो नहीं था
इक रंज-ए-तमन्ना से बहुत सुर्ख़ थीं आँखें
सद शुक्र-ए-ख़ुदा नश्शा-ए-बादा तो नहीं था
आए थे तिरे पास घड़ी भर के लिए हम
ता-उम्र ठहरने का इरादा तो नहीं था
आसान तो पहले भी नहीं थी ये रह-ए-दिल
मुश्किल भी मगर इतना ये जादा तो नहीं था
तहरीर थे ख़्वाब और तमन्ना के हवाले
इतना वरक़-ए-दिल कोई सादा तो नहीं था
ऐ दिल सम-ए-अंदोह ज़ियादा तो नहीं था
इक रंज-ए-तमन्ना से बहुत सुर्ख़ थीं आँखें
सद शुक्र-ए-ख़ुदा नश्शा-ए-बादा तो नहीं था
आए थे तिरे पास घड़ी भर के लिए हम
ता-उम्र ठहरने का इरादा तो नहीं था
आसान तो पहले भी नहीं थी ये रह-ए-दिल
मुश्किल भी मगर इतना ये जादा तो नहीं था
तहरीर थे ख़्वाब और तमन्ना के हवाले
इतना वरक़-ए-दिल कोई सादा तो नहीं था
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