होश-ओ-ख़िरद का जाल बिछाएँगे फिर कभी
By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
होश-ओ-ख़िरद का जाल बिछाएँगे फिर कभी
ज़ाहिद तुम्हारी बात में आएँगे फिर कभी
पहले सुकून छीन लें हम आसमान का
शहर-ए-तरब ज़मीं पे बसाएँगे फिर कभी
होना अभी है लज़्ज़त-ए-गिर्या से मुस्तफ़ीद
नाज़-ओ-अदा के लुत्फ़ उठाएँगे फिर कभी
मज़लूम दिल ये कहता रहा मुझ से 'उम्र-भर
भूले से उस गली में न जाएँगे फिर कभी
तन्हाइयों का जश्न मनाने जनाब-ए-मन
'अह्मर' तुम्हारी बज़्म में आएँगे फिर कभी
ज़ाहिद तुम्हारी बात में आएँगे फिर कभी
पहले सुकून छीन लें हम आसमान का
शहर-ए-तरब ज़मीं पे बसाएँगे फिर कभी
होना अभी है लज़्ज़त-ए-गिर्या से मुस्तफ़ीद
नाज़-ओ-अदा के लुत्फ़ उठाएँगे फिर कभी
मज़लूम दिल ये कहता रहा मुझ से 'उम्र-भर
भूले से उस गली में न जाएँगे फिर कभी
तन्हाइयों का जश्न मनाने जनाब-ए-मन
'अह्मर' तुम्हारी बज़्म में आएँगे फिर कभी
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