हम तिरे शहर में आए तिरे मेहमाँ भी रहे

By jagdeesh-masoomJanuary 3, 2024
हम तिरे शहर में आए तिरे मेहमाँ भी रहे
तुझ को चाहा भी मगर तुझ से गुरेज़ाँ भी रहे
अब कहीं दूर हैं हम तेरे ख़यालों से मगर
हम तिरे शौक़ की रूदाद के 'उनवाँ भी रहे


फिर तिरे प्यार की वो सा’अत-ए-रंगीं न मिली
गर्दिश-ए-वक़्त से हम दस्त-ओ-गरेबाँ भी रहे
रात-भर कोई ख़लिश दिल को सताती ही रही
बंद आँखों में कई ख़्वाब परेशाँ भी रहे


बारहा दिल को हुआ तर्क-ए-त'अल्लुक़ का जुनूँ
और फिर तुझ से मुलाक़ात के अरमाँ भी रहे
न गई दिल की ये आशुफ़्ता-मिज़ाजी न गई
हम सुलैमाँ भी हुए बे-सर-ओ-सामाँ भी रहे


लुट गईं जिन के सबब दिल की बहारें 'मा’सूम'
गुलशन-ए-दिल के वही लोग निगहबाँ भी रहे
22136 viewsghazalHindi