हम ने यूँ ख़ुद से तिरा ज़िक्र किया शाम के बा'द
By umair-ali-anjumJanuary 5, 2024
हम ने यूँ ख़ुद से तिरा ज़िक्र किया शाम के बा'द
जैसे गुलशन में चले सर्द हवा शाम के बाद
मुझ को मय-ख़्वार समझती रही शब-भर दुनिया
जब तिरे हिज्र का मशरूब पिया शाम के बा'द
जिस की यादों को भुलाने में गुज़र जाता है दिन
लब पे आ जाता है वो मिस्ल-ए-दु’आ शाम के बा'द
अश्क आँखों में लिए रोज़ तुझे ढूँढता है
तेरे कूचे में कोई आबला-पा शाम के बा'द
दिल की वहशत के ये मौसम भी निराले हैं 'उमैर'
बंद कमरे में बरसती है घटा शाम के बा'द
जैसे गुलशन में चले सर्द हवा शाम के बाद
मुझ को मय-ख़्वार समझती रही शब-भर दुनिया
जब तिरे हिज्र का मशरूब पिया शाम के बा'द
जिस की यादों को भुलाने में गुज़र जाता है दिन
लब पे आ जाता है वो मिस्ल-ए-दु’आ शाम के बा'द
अश्क आँखों में लिए रोज़ तुझे ढूँढता है
तेरे कूचे में कोई आबला-पा शाम के बा'द
दिल की वहशत के ये मौसम भी निराले हैं 'उमैर'
बंद कमरे में बरसती है घटा शाम के बा'द
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