हुस्न-ए-नवा-ए-शौक़ की ता’मील कर चले

By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
हुस्न-ए-नवा-ए-शौक़ की ता’मील कर चले
सर को उठाए 'अह्द की तकमील कर चले
ख़ाकी बदन को आतिश-ए-दाइम की लौ पे रख
हिद्दत बरा-ए-जान की तर्सील कर चले


दर्दों-भरी दरीदा रिदा-ए-हयात को
ताने से बाना जोड़ के ज़म्बील कर चले
नूरी तजल्लियात को परवाज़-ओ-पर दिए
अपने तख़य्युलात को जिब्रील कर चले


अपनी अना-ए-होश का सौदा नहीं किया
पुर-जोश रह के ख़ौफ़ की तज़लील कर चले
कल शब तिरे ख़याल के पहलू में बैठ कर
ग़म-हा-ए-रोज़गार से ता’तील कर चले


मैं ने सदा-ए-हक़ को किया सरबुलंद और
बाक़ी तमाम काम अबाबील कर चले
दिल की जबीं को आप की चौखट पे टेक कर
आँखों को इंतिज़ार में तहलील कर चले


गहरी सियाह रात में ख़ुद को जला के हम
मिस्ल-ए-मिसाल-ए-रौशनी तमसील कर चले
अन्दर की चुप को किस ने 'अता कर दी धड़कनें
'हसरत' नई ज़बान में तफ़्सील कर चले


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