इस भरोसे पे कि शायद कोई आए घर में

By shahbaz-talibJanuary 5, 2024
इस भरोसे पे कि शायद कोई आए घर में
हम ने दीवार नहीं दर भी बनाए घर में
कौन अब नक़्ल-ए-मकानी की उठाए ज़हमत
कौन आबाद करे ख़ुद को पराए घर में


चलिए ताक़ों पे नहीं तो मिरी पलकों पे सही
कुछ दिये तो कफ़-ए-वहशत ने जलाए घर में
ख़ाक-जिस्मों में कोई ख़तरा नहीं है दिल को
संग महफ़ूज़ हैं मिट्टी के बनाए घर में


जिस को रखनी हो मोहब्बत की चमक आँखों में
क़ैस-ओ-फ़रहाद की तस्वीर लगाए घर में
मेरी बीनाई ने ख़ल्वत से निकाला मुझ को
मेरी तन्हाई ने पैदा किए साए घर में


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