इस क़दर आँधियों से डरता है
By fahmi-badayuniFebruary 5, 2024
इस क़दर आँधियों से डरता है
वो क़फ़स में उड़ान भरता है
उस से कुछ भी नहीं छुपाते हम
वो हमारा 'इलाज करता है
कोई तो पेड़ की जड़ों में है
जो फलों में मिठास भरता है
ख़त्म ये ज़िंदगी नहीं होती
आदमी ता-हयात मरता है
लाख ज़ीने बनाओ लेकिन चाँद
टूटी छत पर नहीं उतरता है
इतने तारे कहाँ से आते हैं
आसमाँ पर ये क्या बिखरता है
रोज़ बतलाता हूँ चराग़ों को
कितनी मुश्किल से दिन गुज़रता है
तान रक्खी है इस तरह गर्दन
जैसे हम से भी कोई डरता है
वो क़फ़स में उड़ान भरता है
उस से कुछ भी नहीं छुपाते हम
वो हमारा 'इलाज करता है
कोई तो पेड़ की जड़ों में है
जो फलों में मिठास भरता है
ख़त्म ये ज़िंदगी नहीं होती
आदमी ता-हयात मरता है
लाख ज़ीने बनाओ लेकिन चाँद
टूटी छत पर नहीं उतरता है
इतने तारे कहाँ से आते हैं
आसमाँ पर ये क्या बिखरता है
रोज़ बतलाता हूँ चराग़ों को
कितनी मुश्किल से दिन गुज़रता है
तान रक्खी है इस तरह गर्दन
जैसे हम से भी कोई डरता है
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