इस क़दर मुश्ताक़ परवाना हुआ था सुब्ह का

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
इस क़दर मुश्ताक़ परवाना हुआ था सुब्ह का
शम' की लौ से फ़साना सुन रहा था सुब्ह का
रात की आग़ोश में हैं दफ़्न मेरे रतजगे
तेरी हर आवाज़ पे धोका हुआ था सुब्ह का


शाम में क्या मुज़्दा-ए-जाँ-बख़्श था कि रात-भर
बच्चा बच्चा इंतिज़ारी लग रहा था सुब्ह का
बंद पलकों पर कोई ख़्वाब-ए-जरस आने को था
और छत पे क़ाफ़िला ठहरा हुआ था सुब्ह का


रौशन आँखें बुझ गई थीं रात के जिस मोड़ पर
उस से आगे दूर तक इक सिलसिला था सुब्ह का
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