इस से ज़ियादा क्या कहूँ मैं अब सिफ़ात में

By satyawan-satyaJanuary 5, 2024
इस से ज़ियादा क्या कहूँ मैं अब सिफ़ात में
तुम सा नहीं है कोई भी इस काएनात में
जब से मिले हो तुम मुझे ख़ुद का न होश है
दिन रात खोया रहता हूँ तेरी ही ज़ात में


बदली नज़र तुम्हारी तो दुनिया बदल गई
सब कुछ बदल गया मिरा फिर इस हयात में
अबरू निगाहें 'अक्स तिरे होंठ चाल सब
शामिल हैं मेरे क़त्ल की ये वारदात में


उन के दिल-ओ-दिमाग़ पे रहता है ख़ौफ़ सा
अपने ही जिन के मर गए हैं हादसात में
होना था जिस में वस्ल क़यामत की रात थी
सब खो गया वजूद मिरा एक रात में


28668 viewsghazalHindi