'इश्क़ का ये दस्तूर नहीं है
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
'इश्क़ का ये दस्तूर नहीं है
कोई भी मंसूर नहीं है
एक नज़र ऐ बर्क़-ए-तजल्ली
दिल है हमारा तूर नहीं है
ख़ून हमारा छुप न सकेगा
ख़ून है ये काफ़ूर नहीं है
राही हिम्मत हार न दीजो
मंज़िल अब कुछ दूर नहीं है
हुस्न ने डालीं लाख नक़ाबें
पर दिल से मस्तूर नहीं है
आज मुझे ऐ हुस्न बता दे
क्या तू भी मजबूर नहीं है
'मैकश' कब मजबूर नहीं था
साक़ी तो मजबूर नहीं है
कोई भी मंसूर नहीं है
एक नज़र ऐ बर्क़-ए-तजल्ली
दिल है हमारा तूर नहीं है
ख़ून हमारा छुप न सकेगा
ख़ून है ये काफ़ूर नहीं है
राही हिम्मत हार न दीजो
मंज़िल अब कुछ दूर नहीं है
हुस्न ने डालीं लाख नक़ाबें
पर दिल से मस्तूर नहीं है
आज मुझे ऐ हुस्न बता दे
क्या तू भी मजबूर नहीं है
'मैकश' कब मजबूर नहीं था
साक़ी तो मजबूर नहीं है
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