'इश्क़ के ज़माने भी क्या 'अजब ज़माने थे

By wasim-nadirJanuary 5, 2024
'इश्क़ के ज़माने भी क्या 'अजब ज़माने थे
आग पर भी चलना था पाँव भी बचाने थे
कुछ धुआँ भी शामिल था शहर की हवाओं में
कुछ हमारी आँखों में ज़ख़्म भी पुराने थे


रतजगों ने बीनाई छीन ली तो हैरत क्या
'अक़्ल के कभी तुम ने मशवरे न माने थे
कितनी जान-लेवा थी कश्मकश मोहब्बत की
तेरे राज़ थे दिल में तुझ से ही छुपाने थे


रास्ता दिखाते थे लफ़्ज़ रौशनी बन कर
कैसे लोग थे वो भी वो भी क्या ज़माने थे
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