'इश्क़ को छोड़ कर और सब बात की

By surender-sagarJanuary 5, 2024
'इश्क़ को छोड़ कर और सब बात की
उस ने जब जब भी मुझ से मुलाक़ात की
हिज्र कहता है सूरज न डूबे कभी
और ख़्वाबों की ख़्वाहिश है फिर रात की


आज ठहरेंगे हम भी तिरे शहर में
बादलों से गुज़ारिश है बरसात की
इक क़लम मैं ने तोहफ़े में क्या दी उसे
उस ने हर दफ़'अ फिर उस की ही बात की


ज़िंदगी-भर उजालों को तरसे हैं हम
इंतिहा हो गई देख ज़ुल्मात की
मेरी आँखों में लोगों ने देखा तुम्हें
जब भी चश्मा उतारा तिरी बात की


ज़िक्र जब भी मिरी शा'इरी का हुआ
सब ने बौछार कर दी हिदायात की
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