'इश्क़ में हासिल-ए-इंकार से डर जाते हैं
By ahmar-nadeemFebruary 5, 2024
'इश्क़ में हासिल-ए-इंकार से डर जाते हैं
हम गुनहगार हैं इक़रार से डर जाते हैं
मौत बर-हक़ है जब आ जाए हमें क्या लेकिन
ज़िंदगी हम तिरी रफ़्तार से डर जाते हैं
अपनी वहशत का सबब हम को है मा'लूम मगर
क्या सबब है दर-ओ-दीवार से डर जाते हैं
नग़्मा-ए-ज़ीस्त पे जिन जिन के थिरकते हैं क़दम
दफ़'अतन ज़ीस्त के आसार से डर जाते हैं
कुछ तबी'अत की रवानी से भी ख़ौफ़ आता है
कुछ मज़ामीन की यलग़ार से डर जाते हैं
दिन में फिरते हैं लिए कासा-ए-ख़ाली 'अहमर’
शाम होते ही जो घर-बार से डर जाते हैं
हम गुनहगार हैं इक़रार से डर जाते हैं
मौत बर-हक़ है जब आ जाए हमें क्या लेकिन
ज़िंदगी हम तिरी रफ़्तार से डर जाते हैं
अपनी वहशत का सबब हम को है मा'लूम मगर
क्या सबब है दर-ओ-दीवार से डर जाते हैं
नग़्मा-ए-ज़ीस्त पे जिन जिन के थिरकते हैं क़दम
दफ़'अतन ज़ीस्त के आसार से डर जाते हैं
कुछ तबी'अत की रवानी से भी ख़ौफ़ आता है
कुछ मज़ामीन की यलग़ार से डर जाते हैं
दिन में फिरते हैं लिए कासा-ए-ख़ाली 'अहमर’
शाम होते ही जो घर-बार से डर जाते हैं
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