'इश्क़ में रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ न रहा

By raft-bahraichiJanuary 4, 2024
'इश्क़ में रब्त-ए-जिस्म-ओ-जाँ न रहा
अपना अपने पे मेहरबाँ न रहा
हुस्न किस शय से कब 'अयाँ न रहा
वो निहाँ हो के भी निहाँ न रहा


कब वफ़ाएँ न कामयाब हुईं
कब तमाशा-ए-इम्तिहाँ न रहा
शान उस में भी थी मोहब्बत की
मैं जो आमादा-ए-फ़ुग़ाँ न रहा


कब तिरे 'इश्क़ की न की तौक़ीर
कब मैं हस्ती से बद-गुमाँ न रहा
हर नफ़स थीं मआल पर नज़रें
शादमानी पे शादमाँ न रहा


कहिए इस बेकसी को क्या कहिए
मैं रहा और आशियाँ न रहा
अल्लाह अल्लाह स’ऊबत-ए-रह-ए-'इश्क़
दो क़दम साथ रहरवाँ न रहा


ज़ीस्त से क्या उमीद उल्फ़त में
दिल सा जब दोस्त मेहरबाँ न रहा
दे के जाँ 'इश्क़ में उन्हें पाया
ये तो सौदा कोई गिराँ न रहा


कब उठाए न रंज ऐ 'राफ़त'
किस ज़मीं पर ये आसमाँ न रहा
50549 viewsghazalHindi