'इश्क़ में तुम को अगर जो सादगी मंज़ूर होती
By rubalJanuary 4, 2024
'इश्क़ में तुम को अगर जो सादगी मंज़ूर होती
फिर उदासी भी मिरी चेहरे पे जैसे नूर होती
तू अगर देता दिलासा घेर कर बाँहों में मुझ को
दर्द में होती अगर तो भी बहुत मसरूर होती
फिर नहीं होती कभी दूरी मोहब्बत में ज़रा भी
दो-जहाँ में इस क़दर दीवानगी मशहूर होती
ख़ाक होती ज़िंदगी तो ग़म न होता एक पल भी
पर मोहब्बत से भरी ये ज़िंदगी भरपूर होती
तू न होता बेवफ़ा तो मैं वफ़ा दिल से निभाती
मैं ख़ुदा सा यार पा कर 'इश्क़ में मग़रूर होती
जिस्म से आगे निकल कर 'इश्क़ करता रूह से जो
टूट कर क़दमों में तेरे प्रेयसी भी चूर होती
फिर उदासी भी मिरी चेहरे पे जैसे नूर होती
तू अगर देता दिलासा घेर कर बाँहों में मुझ को
दर्द में होती अगर तो भी बहुत मसरूर होती
फिर नहीं होती कभी दूरी मोहब्बत में ज़रा भी
दो-जहाँ में इस क़दर दीवानगी मशहूर होती
ख़ाक होती ज़िंदगी तो ग़म न होता एक पल भी
पर मोहब्बत से भरी ये ज़िंदगी भरपूर होती
तू न होता बेवफ़ा तो मैं वफ़ा दिल से निभाती
मैं ख़ुदा सा यार पा कर 'इश्क़ में मग़रूर होती
जिस्म से आगे निकल कर 'इश्क़ करता रूह से जो
टूट कर क़दमों में तेरे प्रेयसी भी चूर होती
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