जब मिरे जज़्बात को छू कर गुज़र जाती है रात

By sajid-sajni-lakhnawiJanuary 4, 2024
जब मिरे जज़्बात को छू कर गुज़र जाती है रात
आग सी गोया मिरी रग रग में भर जाती है रात
सब ये कहते हैं कि बातों में गुज़र जाती है रात
मुझ को तन्हा पा के जाने क्यों ठहर जाती है रात


जब कभी अपनी ज़रूरत से निकल जाती हूँ मैं
कुम्बा वालों में मुझे बदनाम कर जाती है रात
सच तो ये है दिन-दहाड़े जिन का होना है मुहाल
पर्दे पर्दे में वो सारे काम कर जाती है रात


इस निगोड़ी का तो दुनिया से निराला है चलन
फैलती ठंडक से गर्मी से ठिठुर जाती है रात
30743 viewsghazalHindi