जादा-ए-उलफ़त का ये सब्र-आज़मा 'आलम न पूछ
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
जादा-ए-उलफ़त का ये सब्र-आज़मा 'आलम न पूछ
हर क़दम पर ग़म की मंज़िल के सिवा कुछ भी नहीं
यूँ तसव्वुर ने बढ़ाए हौसले तूफ़ान में
जैसे हर इक मौज-ए-साहिल के सिवा कुछ भी नहीं
उन की ख़ल्वत-गाह भी है उन की जल्वत-गाह भी
वुस’अत-ए-कौनैन में दिल के सिवा कुछ भी नहीं
ज़र्रे ज़र्रे में हैं रंगा-रंग बज़्म-आराइयाँ
दोनों 'आलम तेरी महफ़िल के सिवा कुछ भी नहीं
बस अजल के बा'द मिलती है हयात-ए-जावेदाँ
ज़िंदगी इक नक़्श-ए-बातिल के सिवा कुछ भी नहीं
शिकवा-ए-बे-चारगी 'मैकश' किसी से क्यों करें
'इश्क़ तो महरूमी-ए-दिल के सिवा कुछ भी नहीं
हर क़दम पर ग़म की मंज़िल के सिवा कुछ भी नहीं
यूँ तसव्वुर ने बढ़ाए हौसले तूफ़ान में
जैसे हर इक मौज-ए-साहिल के सिवा कुछ भी नहीं
उन की ख़ल्वत-गाह भी है उन की जल्वत-गाह भी
वुस’अत-ए-कौनैन में दिल के सिवा कुछ भी नहीं
ज़र्रे ज़र्रे में हैं रंगा-रंग बज़्म-आराइयाँ
दोनों 'आलम तेरी महफ़िल के सिवा कुछ भी नहीं
बस अजल के बा'द मिलती है हयात-ए-जावेदाँ
ज़िंदगी इक नक़्श-ए-बातिल के सिवा कुछ भी नहीं
शिकवा-ए-बे-चारगी 'मैकश' किसी से क्यों करें
'इश्क़ तो महरूमी-ए-दिल के सिवा कुछ भी नहीं
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