जागता जीता बदन भी वहम भी साया भी हूँ

By basheer-ahmad-basheerJanuary 2, 2024
जागता जीता बदन भी वहम भी साया भी हूँ
इक तरह मोहकम हक़ीक़त इक तरह धोका भी हूँ
रूप इक वो भी है मेरा रूप इक ये भी मिरा
तेरा मज़हर हूँ ख़ुद अपनी ज़ात का पर्दा भी हूँ


कल मुझे पाओगे क्या कल तक तो हूँ रेग-ए-रवाँ
देख लो मुझ को इसी लम्हे कि आईना भी हूँ
मैं कि हूँ अब इन सिलों के सर्द सन्नाटों में गुम
तोड़ कर देखो मुझे तो महशर-ए-बरपा भी हूँ


तुम ने सदियों आज़माया फिर वही मुझ से उमीद
लक्का-ए-अब्र-ए-रवाँ हूँ मैं कभी ठहरा भी हूँ
मैं अबद भी हूँ अज़ल भी हर ज़माने का हूँ इस्म
आने वाली रुत भी हूँ बीता हुआ लम्हा भी हूँ


किस जिहत अब जाऊँ तेरी सम्त या अपनी तरफ़
हादिसा कुछ कम नहीं तेरा भी हूँ अपना भी हूँ
जो भी अब चाहो समझ लो जो भी अब कह लो 'बशीर'
सामने मौजूद हूँ जो कुछ भी हूँ जैसा भी हूँ


72212 viewsghazalHindi