जिन्हें हम याद कर के रो रहे हैं

By fahmi-badayuniFebruary 5, 2024
जिन्हें हम याद कर के रो रहे हैं
उन्हीं मुर्दों का विर्सा ढो रहे हैं
वो खींचे जा रहा है अपनी जानिब
हम अपनी हद से बाहर हो रहे हैं


हमें क़िस्तों में मरना पड़ रहा है
वो क़िस्तों में पराए हो रहे हैं
मता'-ए-ज़िंदगी की पीठ पर हम
तुम्हारी बे-रुख़ी भी ढो रहे हैं


बड़ा उल्टा ज़माना आ गया है
मोहब्बत करने वाले सो रहे हैं
ख़ुदा का शुक्र है ग़म पर हमारे
जो ख़ुश होते थे वो भी रो रहे हैं


हम अपने सहन के गमलों में अब तक
तुम्हारी मुस्कुराहट बो रहे हैं
17340 viewsghazalHindi