जिन को भूले हुए ज़माना हुआ
By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
जिन को भूले हुए ज़माना हुआ
उन के घर फिर से आना जाना हुआ
ज़र्फ़ ने तोड़ा 'आशिक़ी का भरम
ख़त्म इक पल में दोस्ताना हुआ
तुम जो आए तो चाँद निकला है
और मौसम भी 'आशिक़ाना हुआ
फिर उसे होश किस तरह आए
तेरी नज़रों का जो निशाना हुआ
शे'र कहने लगे जो मस्ती में
अपना अंदाज़ सूफियाना हुआ
दश्त-ओ-सहरा चमन न कूचा-ए-यार
'आशिक़ों का कहाँ ठिकाना हुआ
क्यों 'वजाहत' करें किसी से गिला
हम को रुस्वा हुए ज़माना हुआ
उन के घर फिर से आना जाना हुआ
ज़र्फ़ ने तोड़ा 'आशिक़ी का भरम
ख़त्म इक पल में दोस्ताना हुआ
तुम जो आए तो चाँद निकला है
और मौसम भी 'आशिक़ाना हुआ
फिर उसे होश किस तरह आए
तेरी नज़रों का जो निशाना हुआ
शे'र कहने लगे जो मस्ती में
अपना अंदाज़ सूफियाना हुआ
दश्त-ओ-सहरा चमन न कूचा-ए-यार
'आशिक़ों का कहाँ ठिकाना हुआ
क्यों 'वजाहत' करें किसी से गिला
हम को रुस्वा हुए ज़माना हुआ
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