जो हक़ पे चलता है सच का निशान खींचता है
By saqib-qamri-misbahiJanuary 4, 2024
जो हक़ पे चलता है सच का निशान खींचता है
उसी की खाल तो सारा जहान खींचता है
सवार अस्प की जैसे ‘इनान खींचता है
मिरी ख़ता पे वो वैसे ही कान खींचता है
मैं उस के सामने सीना-सिपर ही रहता हूँ
वो जब कमीन से अपना कमान खींचता है
वो पहले सामने रक्खे किसान का ख़ाका
अगर कहीं कोई तस्वीर नान खींचता है
किसी महाज़ पे जब भी निकलना चाहता हूँ
तो मेरे पाँव को कुल ख़ानदान खींचता है
हमीं मुहाफ़िज़-ए-नामूस-ए-'इश्क़-ओ-'इरफ़ाँ हैं
हमीं पे हर कोई तेग़-ओ-सिनान खींचता है
किसी भी हाल में मरता नहीं मिरा किरदार
कोई जो सिलसिला-ए-दास्तान खींचता है
मैं एक ऐसा ही ख़ाना-ब-दोश हूँ 'साक़िब'
जो अपने हाथ से अपना मकान खींचता है
उसी की खाल तो सारा जहान खींचता है
सवार अस्प की जैसे ‘इनान खींचता है
मिरी ख़ता पे वो वैसे ही कान खींचता है
मैं उस के सामने सीना-सिपर ही रहता हूँ
वो जब कमीन से अपना कमान खींचता है
वो पहले सामने रक्खे किसान का ख़ाका
अगर कहीं कोई तस्वीर नान खींचता है
किसी महाज़ पे जब भी निकलना चाहता हूँ
तो मेरे पाँव को कुल ख़ानदान खींचता है
हमीं मुहाफ़िज़-ए-नामूस-ए-'इश्क़-ओ-'इरफ़ाँ हैं
हमीं पे हर कोई तेग़-ओ-सिनान खींचता है
किसी भी हाल में मरता नहीं मिरा किरदार
कोई जो सिलसिला-ए-दास्तान खींचता है
मैं एक ऐसा ही ख़ाना-ब-दोश हूँ 'साक़िब'
जो अपने हाथ से अपना मकान खींचता है
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