जो उल्फ़त की बिना पर झोंपड़ी है
By mirza-naseer-khalidJanuary 4, 2024
जो उल्फ़त की बिना पर झोंपड़ी है
हक़ीक़त में वो महलों से बड़ी है
तुझे क्या तू तो है इक जलता सूरज
मुझे तो अपनी आँखों की पड़ी है
हज़ारों रंग से है जल्वा-फ़रमा
मोहब्बत ज़िंदगी है फुलझड़ी है
क़दम-बोसी को बरखा-रुत की मालन
मिरे दर पर लिए गजरे खड़ी है
हमारे रहबरों का अस्ल चेहरा
'अजाइब-घर में रक्खी खोपड़ी है
बनाया दीन को है जब से मज़हब
सभी को सिर्फ़ बख़्शिश की पड़ी है
किसी के रू-ब-रू रहना भी 'ख़ालिद'
निहायत आज़माइश की घड़ी है
हक़ीक़त में वो महलों से बड़ी है
तुझे क्या तू तो है इक जलता सूरज
मुझे तो अपनी आँखों की पड़ी है
हज़ारों रंग से है जल्वा-फ़रमा
मोहब्बत ज़िंदगी है फुलझड़ी है
क़दम-बोसी को बरखा-रुत की मालन
मिरे दर पर लिए गजरे खड़ी है
हमारे रहबरों का अस्ल चेहरा
'अजाइब-घर में रक्खी खोपड़ी है
बनाया दीन को है जब से मज़हब
सभी को सिर्फ़ बख़्शिश की पड़ी है
किसी के रू-ब-रू रहना भी 'ख़ालिद'
निहायत आज़माइश की घड़ी है
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