जुनूँ को छोड़ ख़िरद की असास रहने दे

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
जुनूँ को छोड़ ख़िरद की असास रहने दे
ज़मीं के जिस्म पे कोई लिबास रहने दे
निज़ाम-ए-दौर-ए-अज़िय्यत कभी तो बदलेगा
उमीद कम है मगर कुछ तो आस रहने दे


ये दूरियाँ ये तजस्सुस ये टीस ये वहशत
कुछ और देर मिरा दिल उदास रहने दे
लहू का ज़ाइक़ा मैं चख रहा हूँ चारागर
न देख ज़ख़्म रखी है कपास रहने दे


वो रोज़-ओ-शब के फ़साने वो दर्द के क़िस्से
निकाल मत अभी दिल की भड़ास रहने दे
किसी का जुर्म किसी और को सज़ा मिल जाए
तू कौन अपनी ज़बाँ पर मिठास रहने दे


रखे उमीद-ए-वफ़ा और इस ज़माने से
फ़ुज़ूल है ये 'वजाहत' क़यास रहने दे
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