कभी आवाज़ दे इक बार कोई
By fahmi-badayuniFebruary 5, 2024
कभी आवाज़ दे इक बार कोई
अगर मौजूद है उस पार कोई
सुकूँ से दिन गुज़रता है हमारा
मंगाते ही नहीं अख़बार कोई
यहाँ दैर-ओ-हरम बनने से पहले
नहीं थी आहनी दीवार कोई
हज़ारों काम हैं दश्त-ए-जुनूँ में
यहाँ फिरता नहीं बेकार कोई
अब ऐसे जुर्म भी होने लगे हैं
नहीं है जिन का ज़िम्मेदार कोई
हम अपना अजनबी-पन भूल जाएँ
अगर पहचान ले इक बार कोई
सुना है कल तिरे कूचे में हम ने
कतर दी हाथ से तलवार कोई
अगर मौजूद है उस पार कोई
सुकूँ से दिन गुज़रता है हमारा
मंगाते ही नहीं अख़बार कोई
यहाँ दैर-ओ-हरम बनने से पहले
नहीं थी आहनी दीवार कोई
हज़ारों काम हैं दश्त-ए-जुनूँ में
यहाँ फिरता नहीं बेकार कोई
अब ऐसे जुर्म भी होने लगे हैं
नहीं है जिन का ज़िम्मेदार कोई
हम अपना अजनबी-पन भूल जाएँ
अगर पहचान ले इक बार कोई
सुना है कल तिरे कूचे में हम ने
कतर दी हाथ से तलवार कोई
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