कभी दिमाग़ कभी दिल सता रहा है मुझे

By shariq-ali-shariqJanuary 5, 2024
कभी दिमाग़ कभी दिल सता रहा है मुझे
ये कैसा दर्द मिरे हम-नवा दिया है मुझे
उभर गए हैं सरापा नुक़ूश आँखों में
वो हर्फ़ हर्फ़ बहुत याद आ रहा है मुझे


तुम्हारे हुस्न की ता'रीफ़ लिखता फिरता हूँ
ज़माना ऐसे ही शा'इर समझ रहा है मुझे
किया है इस तरह बदनाम 'इश्क़ ने तेरे
तिरी गली का हर इक शख़्स जानता है मुझे


कोई मिले न मिले फ़र्क़ कुछ नहीं पड़ता
बस एक तुम से ज़माने में वास्ता है मुझे
मैं इन पे रख सकूँ इल्ज़ाम क़त्ल का अपने
तुम्हारी आँखों से इतना तो फ़ाएदा है मुझे


मैं जपता फिरता हूँ तेरा ही नाम हर लम्हा
तिरी निगाह ने पागल बना दिया है मुझे
तुम्हारे नाम से 'शारिक़-अली’ हुआ मंसूब
तुम्हारे नाम ज़माने ने लिख दिया है मुझे


18735 viewsghazalHindi