कभी ज़मीं तो कभी आसमाँ से गुज़री है

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
कभी ज़मीं तो कभी आसमाँ से गुज़री है
दु'आ जो हो के तिरे आस्ताँ से गुज़री है
हुआ है बारगह-ए-कुल पे रहमतों का नुज़ूल
मिरे हुज़ूर की हस्ती जहाँ से गुज़री है


हुई है बंद हर इक बद-निगाही ताले में
हिजाब में कोई लड़की यहाँ से गुज़री है
वो आए बज़्म में ऐसे कि यूँ लगा मुझ को
नसीम-ए-सुब्ह किसी गुलसिताँ से गुज़री है


सुकून कैसे मयस्सर हो तेरे 'आशिक़ को
कि तेरी याद दिल-ए-ना-तवाँ से गुज़री है
वो नूर छनता रहा जिस की रौशनी ऐ दिल
कभी मकाँ तो कभी ला-मकाँ से गुज़री है


हर उस मक़ाम पे रौशन थीं मश'अलें 'दाएम'
जुनून-ए-शौक़ में हस्ती जहाँ से गुज़री है
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