कहीं उड़ा न ले जाएँ ये आँधियाँ मुझ को
By surender-sagarJanuary 5, 2024
कहीं उड़ा न ले जाएँ ये आँधियाँ मुझ को
छुपा ले बादलों में आज आसमाँ मुझ को
जो कर चुका है जला कर कभी धुआँ मुझ को
वो आज ढूँढ रहा था यहाँ-वहाँ मुझ को
ये बार-बार चली आती हैं जो पास मिरे
समझती हैं कोई साहिल ये कश्तियाँ मुझ को
महक गुलाब के जैसी है तेरे छूने में
तलाश करती रहीं कितनी तितलियाँ मुझ को
छुपाता फिरता रहा 'इश्क़ जो ज़माना से
मिले हैं उस की मोहब्बत के कुछ निशाँ मुझ को
अब इक तरफ़ है वफ़ा और इक तरफ़ है क़ज़ा
ख़ुदा ने रक्खा कहाँ इन के दरमियाँ मुझ को
कोई तो याद यहाँ करता रहता है 'सागर'
जो कर रही हैं परेशान हिचकियाँ मुझ को
छुपा ले बादलों में आज आसमाँ मुझ को
जो कर चुका है जला कर कभी धुआँ मुझ को
वो आज ढूँढ रहा था यहाँ-वहाँ मुझ को
ये बार-बार चली आती हैं जो पास मिरे
समझती हैं कोई साहिल ये कश्तियाँ मुझ को
महक गुलाब के जैसी है तेरे छूने में
तलाश करती रहीं कितनी तितलियाँ मुझ को
छुपाता फिरता रहा 'इश्क़ जो ज़माना से
मिले हैं उस की मोहब्बत के कुछ निशाँ मुझ को
अब इक तरफ़ है वफ़ा और इक तरफ़ है क़ज़ा
ख़ुदा ने रक्खा कहाँ इन के दरमियाँ मुझ को
कोई तो याद यहाँ करता रहता है 'सागर'
जो कर रही हैं परेशान हिचकियाँ मुझ को
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