कैसे नसीब का कोई चक्कर बदल गया

By surender-sagarJanuary 5, 2024
कैसे नसीब का कोई चक्कर बदल गया
मेरा ठिकाना बदला तिरा घर बदल गया
दरिया के हम किनारे मिलेंगे कभी नहीं
बदली फ़ज़ाएँ ऐसी कि मंज़र बदल गया


कोई ख़बर न उस की न पैग़ाम ही मिला
आता नहीं है छत पे कबूतर बदल गया
मुमकिन नहीं हमारी मुलाक़ात हो कभी
अब तेरे कूचे से मिरा दफ़्तर बदल गया


उम्मीद थी सभी को निभा देंगे 'उम्र-भर
पक्का इरादा उन का ये क्यूँकर बदल गया
जिस की मिसाल देते थका मैं नहीं कभी
हैरान हूँ कि कैसे वो दिलबर बदल गया


तय था बदलना उस का भला कैसे रोकते
अफ़सोस क्यों करें मिरा 'सागर' बदल गया
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