काले कव्वों ने तबाही वो मचाई तौबा
By hasrat-khan-khatakJanuary 3, 2024
काले कव्वों ने तबाही वो मचाई तौबा
बाग़ के तोते उड़े बाग़ में अमरूद न थे
मेरे बारे में बड़े लोगों ने क्या क्या न कहा
वाक़ि'आ ये कि जिन्हें सुनना था मौजूद न थे
मस्जिदें बैन किए जाती थीं ख़ामोशी से
सज्दा-गाहें थी मगर साजिद-ओ-मस्जूद न थे
एक को सज्दा किया एक बसाया दिल में
अच्छे लगते थे मुझे बुत मिरे मा'बूद न थे
उन के होते हुए क्या क़ौम तरक़्क़ी करती
मुक़्तदिर थे वो कोई साहिब-ए-बहबूद न थे
तुम से पहले भी कहाँ अच्छे थे इतने लेकिन
बिगड़े सँवरे हुए हालात थे नाबूद न थे
मैं ना कहता था अहद होते हैं ला-हद सारे
‘ख़ान-हसरत' के इरादे कभी महदूद न थे
बाग़ के तोते उड़े बाग़ में अमरूद न थे
मेरे बारे में बड़े लोगों ने क्या क्या न कहा
वाक़ि'आ ये कि जिन्हें सुनना था मौजूद न थे
मस्जिदें बैन किए जाती थीं ख़ामोशी से
सज्दा-गाहें थी मगर साजिद-ओ-मस्जूद न थे
एक को सज्दा किया एक बसाया दिल में
अच्छे लगते थे मुझे बुत मिरे मा'बूद न थे
उन के होते हुए क्या क़ौम तरक़्क़ी करती
मुक़्तदिर थे वो कोई साहिब-ए-बहबूद न थे
तुम से पहले भी कहाँ अच्छे थे इतने लेकिन
बिगड़े सँवरे हुए हालात थे नाबूद न थे
मैं ना कहता था अहद होते हैं ला-हद सारे
‘ख़ान-हसरत' के इरादे कभी महदूद न थे
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