करता था अपने हुस्न पे क्या क्या क़यास चाँद

By shehzad-anjum-burhaniJanuary 5, 2024
करता था अपने हुस्न पे क्या क्या क़यास चाँद
ठहरा हुआ है छत पे तिरी बद-हवास चाँद
ये किस हसीं का चेहरा-ए-ज़रताब बुझ गया
पहले कभी तो इतना नहीं था उदास चाँद


होंटों की कश्तियों में बदन पार हो गए
दरिया को देखता ही रहा बे-लिबास चाँद
ता'बीर कोई ख़्वाब की लाओ कि उस के पास
करता था जी-हुज़ूरी ब-सद-इल्तिमास चाँद


सारी फ़ज़ा में 'मीर' की वहशत सी छाई है
फिरता है उस के घर के बहुत आस-पास चाँद
'अंजुम' उसी ने अपना मुक़द्दर बना दिया
हम को मिला था एक सितारा-शनास चाँद


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