ख़बर भी अब तिरी हम को नसीब होती नहीं

By rohit-gaur-ruuhJanuary 4, 2024
ख़बर भी अब तिरी हम को नसीब होती नहीं
वो बे-नसीब लकीरें जबीं की खोती नहीं
तिरे बदन की लचक डसती रहती है शब-भर
मुझे तो सोने नहीं देती ख़ुद भी सोती नहीं


तिरा भी हाथ है इस में वगरना सिर्फ़ हवा
यूँ कश्ती मेरी किनारे ही पर डुबोती नहीं
तुम्हारी यादें मिरी पक्की दोस्त हो गई हैं
बसी भी दिल में हैं नश्तर भी अब चुभोती नहीं


20858 viewsghazalHindi