ख़मोश क्यों हैं नज़ारों को देखने वाले
By ustad-azmat-hussain-khanJanuary 5, 2024
ख़मोश क्यों हैं नज़ारों को देखने वाले
बहक न जाएँ इशारों को देखने वाले
निगाह दिल की तरफ़ भी कभी उठाई है
ब-यक निगाह हज़ारों को देखने वाले
निगाह कोई ख़िज़ाँ के लिए भी है कि नहीं
चमन में सिर्फ़ बहारों को देखने वाले
बढ़ाए जाओ क़दम अपना जानिब-ए-मंज़िल
बहुत हैं राह-गुज़ारों को देखने वाले
ज़मीं पे रह के ज़मीं का कोई ख़याल नहीं
फ़लक पे चाँद सितारों को देखने वाले
ये क्यों झिझक से रहे हैं ये क्यों ठिठक से गए
गुलों के साए में ख़ारों को देखने वाले
सफ़ीना शोरिश-ए-तूफ़ाँ की नज़्र हो जाता
न डूबते जो किनारों को देखने वाले
यही है वक़्त कि रुख़ मोड़ दें हवाओं का
कहाँ हैं वक़्त के धारों को देखने वाले
हैं चंद लोग अभी मय-कदे में ऐ साक़ी
तिरी नज़र के इशारों को देखने वाले
जो मेरी आँख से गिर कर है ज़ीनत-ए-दामन
उसे भी देख सितारों को देखने वाले
जो बढ़ गए वही मंज़िल-नसीब थे 'मैकश'
पड़े हुए हैं सहारों को देखने वाले
बहक न जाएँ इशारों को देखने वाले
निगाह दिल की तरफ़ भी कभी उठाई है
ब-यक निगाह हज़ारों को देखने वाले
निगाह कोई ख़िज़ाँ के लिए भी है कि नहीं
चमन में सिर्फ़ बहारों को देखने वाले
बढ़ाए जाओ क़दम अपना जानिब-ए-मंज़िल
बहुत हैं राह-गुज़ारों को देखने वाले
ज़मीं पे रह के ज़मीं का कोई ख़याल नहीं
फ़लक पे चाँद सितारों को देखने वाले
ये क्यों झिझक से रहे हैं ये क्यों ठिठक से गए
गुलों के साए में ख़ारों को देखने वाले
सफ़ीना शोरिश-ए-तूफ़ाँ की नज़्र हो जाता
न डूबते जो किनारों को देखने वाले
यही है वक़्त कि रुख़ मोड़ दें हवाओं का
कहाँ हैं वक़्त के धारों को देखने वाले
हैं चंद लोग अभी मय-कदे में ऐ साक़ी
तिरी नज़र के इशारों को देखने वाले
जो मेरी आँख से गिर कर है ज़ीनत-ए-दामन
उसे भी देख सितारों को देखने वाले
जो बढ़ गए वही मंज़िल-नसीब थे 'मैकश'
पड़े हुए हैं सहारों को देखने वाले
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