खिल उठे चेहरा-ए-गुमनाम जब उस ने देखा
By abdullah-saqibJanuary 6, 2024
खिल उठे चेहरा-ए-गुमनाम जब उस ने देखा
आइने भूल गए काम जब उस ने देखा
सा-रे-गा-मा-पा हुई सुब्ह ज़बाँ जब खोली
फ़ा'इलातुन पे हुई शाम जब उस ने देखा
नीम-जाँ कान लिए उस के क़रीं जा पहुँचे
पुख़्ता पुख़्ता भी हुए ख़ाम जब उस ने देखा
अल्लह अल्लाह ये क्या ख़ूब नज़र-बाज़ी है
मय-कशी पी गई ख़ुद जाम जब उस ने देखा
हज़रत-ए-दिल तो सग-ए-कू-ए-मलामत ठहरे
आ गया आप को आराम जब उस ने देखा
जाँ-कनी मुंतज़िर-ए-चश्म-ए-ग़ज़ाली थी मिरी
और तारीक हुई शाम जब उस ने देखा
आइने भूल गए काम जब उस ने देखा
सा-रे-गा-मा-पा हुई सुब्ह ज़बाँ जब खोली
फ़ा'इलातुन पे हुई शाम जब उस ने देखा
नीम-जाँ कान लिए उस के क़रीं जा पहुँचे
पुख़्ता पुख़्ता भी हुए ख़ाम जब उस ने देखा
अल्लह अल्लाह ये क्या ख़ूब नज़र-बाज़ी है
मय-कशी पी गई ख़ुद जाम जब उस ने देखा
हज़रत-ए-दिल तो सग-ए-कू-ए-मलामत ठहरे
आ गया आप को आराम जब उस ने देखा
जाँ-कनी मुंतज़िर-ए-चश्म-ए-ग़ज़ाली थी मिरी
और तारीक हुई शाम जब उस ने देखा
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