ख़िज़ाँ-रसीदा चमन में बहार रख देना

By ustad-vajahat-husain-khanJanuary 5, 2024
ख़िज़ाँ-रसीदा चमन में बहार रख देना
कोई चराग़ सर-ए-रहगुज़ार रख देना
मैं दिल-फ़सुर्दा सही दिल दिखा नहीं सकता
हमारे रिश्तों में तुम ए'तिबार रख देना


ये दिल-फ़रेब नज़ारे ये दिल-नशीं चेहरे
ग़रीब आँखों में अपना दयार रख देना
मिरा वजूद अगर बोझ लगने लग जाए
तो दरमियान में तुम अपना प्यार रख देना


जो माँग कर न मिले हक़ तो छीन ले बढ़ कर
उठा के ताक़ पे अपने शि'आर रख देना
हमारे 'अह्द के बच्चे ज़हीन हैं फिर भी
तुम अपने हिस्से का कुछ उन पे बार रख देना


जहाँ की रीत 'वजाहत' यही तो देखी है
वफ़ा की राह में काँटे हज़ार रख देना
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