किसी की ज़द पे कोई सर नहीं है

By badr-e-alam-khan-azmiJanuary 2, 2024
किसी की ज़द पे कोई सर नहीं है
तुम्हारे शहर में पत्थर नहीं है
हुआ है क़त्ल अपने फ़िक्र-ओ-फ़न का
मगर ख़ंजर लहू में तर नहीं है


भरे आसेब से ख़ाली मकाँ हैं
वहाँ बस्ती में कोई घर नहीं है
सिखाता है सबक़ दुनिया को लेकिन
उसे अपना सबक़ अज़बर नहीं है


'अजब मख़्लूक़ हैं रहबर हमारे
किसी का धड़ किसी का सर नहीं है
कुचलते हैं उसे पैरों से फिर भी
कोई क़ानून से ऊपर नहीं है


कमाल-ए-फ़न है क़त्ल-ए-'आम उस का
वो शीशागर है आहन-गर नहीं है
सब अपनी अपनी लाशें ढो रहे हैं
यहाँ पर कोई नौहागर नहीं है


नहीं शा'इर सियासत-दाँ है इस को
शु'ऊर-ए-बादा-ओ-साग़र नहीं है
54497 viewsghazalHindi