किसी मक़ाम से गुज़रे नहीं फिसलता है
By aalam-nizamiJanuary 18, 2024
किसी मक़ाम से गुज़रे नहीं फिसलता है
जो हक़-परस्तों के नक़्श-ए-क़दम पे चलता है
सुना है करने लगा है वो रौशनी तक़्सीम
मिरे चराग़ से जिस का चराग़ जलता है
फ़ज़ा-ए-ज़ीस्त पे छाई हुई है तारीकी
बहुत दिनों से ये मंज़र नहीं बदलता है
बिसात इतनी कहाँ है जो छेड़ें सूरज को
इन आँधियों का दियों पर ही ज़ोर चलता है
तुम्हारे ज़ुल्म पे चुप हूँ ये ज़र्फ़ है मेरा
उबलने को तो मिरा भी लहू उबलता है
हमें न कीजिए मजबूर हिजरतों के लिए
दरख़्त अपना ठिकाना नहीं बदलता है
ख़ुदा ही हामी-ओ-नासिर है उस का ऐ 'आलम'
जो खा के बारहा ठोकर नहीं सँभलता है
जो हक़-परस्तों के नक़्श-ए-क़दम पे चलता है
सुना है करने लगा है वो रौशनी तक़्सीम
मिरे चराग़ से जिस का चराग़ जलता है
फ़ज़ा-ए-ज़ीस्त पे छाई हुई है तारीकी
बहुत दिनों से ये मंज़र नहीं बदलता है
बिसात इतनी कहाँ है जो छेड़ें सूरज को
इन आँधियों का दियों पर ही ज़ोर चलता है
तुम्हारे ज़ुल्म पे चुप हूँ ये ज़र्फ़ है मेरा
उबलने को तो मिरा भी लहू उबलता है
हमें न कीजिए मजबूर हिजरतों के लिए
दरख़्त अपना ठिकाना नहीं बदलता है
ख़ुदा ही हामी-ओ-नासिर है उस का ऐ 'आलम'
जो खा के बारहा ठोकर नहीं सँभलता है
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