किया जो 'अह्द कि उस से कभी मिलूँ भी नहीं
By bazm-ansariJanuary 2, 2024
किया जो 'अह्द कि उस से कभी मिलूँ भी नहीं
खुला ये राज़ कि उस बिन कहीं सुकूँ भी नहीं
वो पास आए तो होते हैं और ज़ख़्म हरे
वो दूर जाए तो दिल को क़रार यूँ भी नहीं
मैं उस को पाने की ख़ातिर था बे-सुकूँ कितना
ये क्या हुआ उसे खो कर मैं बे-सुकूँ भी नहीं
रह-ए-वफ़ा में न ख़ुद्दारियों को ठेस लगे
वफ़ा करूँ मगर ऐसे कि मैं झुकूं भी नहीं
ये और बात नहीं सू-ए-ज़न किसी से मुझे
ये बात भी है कि मर्दुम-शनास हूँ भी नहीं
लबों पे मुहर लगा दी है और सर-ए-महफ़िल
वो चाहते हैं कि ख़ामोश मैं रहूँ भी नहीं
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
खुला ये राज़ कि उस बिन कहीं सुकूँ भी नहीं
वो पास आए तो होते हैं और ज़ख़्म हरे
वो दूर जाए तो दिल को क़रार यूँ भी नहीं
मैं उस को पाने की ख़ातिर था बे-सुकूँ कितना
ये क्या हुआ उसे खो कर मैं बे-सुकूँ भी नहीं
रह-ए-वफ़ा में न ख़ुद्दारियों को ठेस लगे
वफ़ा करूँ मगर ऐसे कि मैं झुकूं भी नहीं
ये और बात नहीं सू-ए-ज़न किसी से मुझे
ये बात भी है कि मर्दुम-शनास हूँ भी नहीं
लबों पे मुहर लगा दी है और सर-ए-महफ़िल
वो चाहते हैं कि ख़ामोश मैं रहूँ भी नहीं
गुरेज़ 'बज़्म' ज़रूरी है इल्तिफ़ात में भी
हो रस्म-ओ-राह तो हद से कभी बढ़ूँ भी नहीं
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